Monday, 4 August 2014

यारों दोस्ती बड़ी ही हसीं है.....


ज़माने की तंग गलियों में भटकते-भटकते ही अकेला जब कभी,
सुकूं के दो पल मिलते हैं,
तब याद आता है वो बीता हुआ पल 
जो आगे भी चलेगा, यूँ ही हमेशा, निरंतर,
एक हलकी सी मुस्कान, जो अनायास ही आ जाती है,
जो बताती है, की दोस्ती का वो रिश्ता आज भी कायम है,
और उन्ही भूली-बिसरी यादों के पन्ने पलट जाते हैं,
और एक एक कर तुम सबके चेहरे सामने आते हैं,
फिर वही पुराना ख़याल
कि
भले ही दूर हों, मंजिलों को पाने में थक कर चूर हों
मगर वो एहसास हमारी दोस्ती का आज भी जिंदा है और रहेगा,

एहसास,
तुम सबके संग खुशियाँ मनाने का, गम में साथ बैठकर ग़मगीन हो जाने का,
साथ में बैठकर क्लास की आखिरी बेंच पर, टीचर को Moral & Atticates सिखाने का,
कॉलेज की लड़की में कौन सी भाभी है हमारी, ये साथ बैठकर बताने का,
और बाद में उसके किसी और से पट जाने पर तमाम तरीकों से उसे गरियाने का,

जन्मदिन पर केक काटने से पहले पीटने और पिटवाने का,
फिर पार्टी के नाम पर मेनू की सबसे महंगी चीज आर्डर करवाने का,
सेमेस्टर से पहले की रात इधर उधर घूमकर सब कुछ निपटाने का,
बचा खुचा एग्जाम में खुद ही derive करवाने का,

एहसास,
उन आखिरी दिनों में बात बात पर भावुक होने
और फिर मिलेंगे इस बात के वादे,
मगर वो वादे ही होते हैं शायद, जो निभाये नहीं जाते हैं ,
मगर ये ख़ूबसूरत एहसास कभी जो बिछड नहीं पाते हैं ,
बस उन्ही के झरोखों से जब देखो कभी
तो सारे के सारे ही याद आते हैं,
एहसास उन्ही खूबसूरत बानगी का,
जो आज भी है,और रहेगा, हमेशा, यूँही, निरंतर..........













Monday, 5 August 2013

DEAR, Prabodh bhaiya



Dear प्रबोध भैया,
शायद पहली बार आपको आपके इस नाम से संबोधित कर रहा हूँ और ये आखिरी बार भी है. इसके बाद मैं आपसे कभी बात नहीं करूँगा,कभी सोचूंगा भी नहीं आपके बारे में, जानता हूँ ये थोडा मुश्किल है, बल्कि काफी मुश्किल है पर मैं पूरी कोशिश करूँगा, और फिर क्यूँ करूँ आपसे बात, क्यूँ सोचूं आपके बारे में?? आपने एक बार भी सोच कभी हम सबके बारे में??   कम से कम जय के बारे में  सोचा होता। क्या होगा  सबका?, कैसे कटेगी ये पहाड़ भरी ज़िन्दगी?, सिर्फ आपकी यादों के सहारे?, जिसमे आपके लौट आने की कोई उम्मीद नहीं है, तो फिर  किसका सहारा??

            भैया, आप इस तरह से हमे छोड़कर कैसे चले गए?, मुझे बहुत अकेलापन महसूस हो रहा है, सभी लोग हैं आसपास, सभी लोग, पर फिर भी एक कमी है,जिसे कोई पूरा नहीं कर सकता,कोई भी नहीं। आपको याद है, हमारी पहली मुलाक़ात ,जब आप  मेरी दीदी यानी अपनी भाभी को देखने पूजा भाभी के यहाँ आये थे. तब पहली बार  आपको देखा , गले में तौलिया डाले आप एक टिपिकल सा लुक दे रहे थे पर जब आपसे बात हुई तो आपकी बातचीत का तरीका देखकर मैं कायल हो गया. इस चीज में मैं हमेशा आपसे प्रभावित रहा हूँ और सच कहूँ तो बातचीत का तरीका आपसे ही सिखा  है मैंने।
        दीदी की शादी के बाद जब पहली बार गया था दिल्ली तो कितना परेशान किया था न आपको? मेरे लिए उस समय  लैपटॉप,मल्टीमीडिया फोन, टच स्क्रीन, सब नयी बात  थी, और मैं कभी ये,कभी वो में आपको खूब झिलाता था. पर फिर भी बिना झल्लाये आप वो सब कर देते थे. उसके बाद से तो आप मेरे चहेते बन गए थे. आपको याद है,कॉलेज आने से पहले जब मैं प्रतापगढ़ गया था तो आपके साथ कितनी मौज की थी, उस समय गर्मी चरम पर थी और प्रतापगढ़ में बिजली की किल्लत,पर हम लोग उस गर्मी में भी रात के 2 बजे स्टेशन जाकर चाय पीते थे,फिर वापसी में आपकी रिक्शे से आने की जिद और मेरा आपको पैदल खींचकर ले जाना,कितना खुश रहते थे हम उस बेहाल गर्मी में भी. सुबह के 4-5 बजे सोना और फिर दिन-दोपहरी उठना। भले ही हॉस्टल आकर ये मेरा रोज का क्रम बन गया था मगर उस समय ये सब एक नया अनुभव था मेरे लिए.
                       मेरी पहली रैगिंग आपके द्वारा ही हुई थी,मैं हंस रहा था और तभी एक वेल-ट्रेंड-फ्रस्टेटेड-सीनियर की तरह आपकी डांट, जानता हूँ वो सब आपकी ट्रेनिंग का हिस्सा था पर तब मुझे थोडा खराब लगा था,क्या करूँ? छोटा था ना, बिलकुल आपके नाम की तरह. आज तरस रहा हूँ, उसी डांट के लिए,उसी ट्रेनिंग को,वही रात,स्टेशन की वही चाय,पर अब अकेला हूँ,बिलकुल अकेला। ….

    गाज़ियाबाद आने के बाद मेरा घर आना काफी हो गया था,और घर आने के रास्ते भर  सोचता रहता की आपसे Computer Related कुछ सीखूंगा पर हमारी BC से हमे फुर्सत मिलती तब ना,वापस हॉस्टल लौटते समय हमेशा ही दुखी रहता, सबसे ज्यादा आपसे और नील से बिछड़ने का गम.…
  क्रेज़िनेस तो जैसे कूट-कूटकर भरी थी आपमें। याद है-दीदी की शादी के बाद की पहली होली, आप दिल्ली से कानपुर ठिठुरती ठण्ड में रातभर बाइक चलाकर आये थे, रातभर में ही कितना परेशान थे  हम लोग, और सुबह जब दरवाज़े पे  आपने दस्तक दी तब जाकर चैन मिला हम सबको। हमारी एक साथ पहली और अब आखिरी होली। … हम लोग पापा की वही पुरानी बाइक पर कानपुर घूमने निकले थे,और जब बाइक  पंक्चर हो गयी थी तो धक्का लगाकर वापस घर आये थे, होली की वजह से कोई दुकान भी तो नहीं खुली थी. और फिर शाम को जे. के. मंदिर के दर्शन के समय की तमाम मस्तियाँ।

आप सच में कभी अकेले तो घर आये ही नहीं, जब भी आये तमाम खुशियाँ ,ढेरों  मस्ती और छोटी-छोटी सीख लाये उन्हें हमारी ज़िन्दगी में उपहार स्वरुप दे दिया और फिर से अपने आशियाने की ओर उड़ गये.  वो उड़ान क्षणिक थी मगर ये ??  इस तरह से सब कुछ छोड़कर चले जाना, ये चीज तो नहीं थी ना आपमें।  मगर भैया,अब करूँ भी तो क्या? आप होते तो आपको मारता,चीखता,चिल्लाता आप पर,और पूछता की आखिर क्यों? क्या इस तरह से एक बार भी ख्याल नहीं आया अपने पापा का,मम्मी का,भैया,भाभी,जय, और जान से प्यारे अपने भतीजे का?? अरे नील को तो अभी पता भी नहीं आपके बारे में, वो तो इस उम्मीद में है की उसके चाचा अभी दिल्ली में हैं,और अभी उसके जन्मदिन पर उसके लिए एक अच्छा सा गिफ्ट लाकर उसे देंगे। अब आइये,लाइए,और दीजिये ना गिफ्ट, बड़ा शौक था न आपको सबको खुश रखने का,अब रखिये  खुश. ।

        नवम्बर में जब आप अपना रूम शिफ्ट कर रहे थे तो जाने कितनी बार बुलाया था आपने मुझे पर पेपरों के चक्कर में मैं नहीं आ पाया था, 9 महीने बाद उसी घर से इस कदर वो सारा सामान शिफ्ट करना पड़ेगा,कभी ज़िन्दगी में नहीं सोचा था. भैया,वो घर आबाद था,पर वीराना लगता है,उस कमरे की हर एक चीज जैसे आपका बिम्ब लगती थी, वहां की छोटी सी कील को भी समेटकर रखा है,उसमे आप बसे हैं,आपसे जुडा हर एक पल सजा है उसमे।  आप होते तो ये सब कभी ना देख पाते,उस भाई को,जिसने आपको हमेशा छोटे भाई की तरह माना,उन सामानों को अपने आंसुओं तले समेटते हुए, अपनी भाभी को अपने भाई से भी ज्यादा प्यारे देवर की हर एक चीज सहेजकर,उसे छूकर,देखकर,और मन ही मन जाने कितना रो रहे थे सब. अरे,नील को तो पता भी नहीं था की हम सब वहां गए क्यूँ हैं?,ये सारा सामान किसका है?,और क्यूँ इस तरह से जा रहा है??
   भैया,मैंने जीजाजी को मन ही मन रोते देखा,दुःख जब अतिरेक में पहुच जाता तो अपनी आँखें बड़ी करके जैसे सारा कुछ उसी में समेटने की कोशिश करते,चेहरे पर स्थितियों और भावनाओं का द्वन्द लिए,हर संभव प्रयास अपने आँसू छिपाने का,लेकिन आखिरकार वो ज्वार भी फूटा,मेरे लिए ये सब देख पाना बहुत ही मुश्किल था.  मैं खुद उस घर में रोया,ज़िन्दगी में पहली बार इतना,क्षण-प्रतिक्षण रोकना मुश्किल होता था खुद को,क्या करूँ?/ ज़िन्दगी में इतना लगाव किसी से रहा भी नहीं था भैया।।
              आपकी शादी की तमाम यादें याद आती थी,आपके साथ आपकी ही गाडी में बैठकर गए थे हम तो,रास्ते भर कितना special सा एहसास हो रहा था मुझे,भई  दुल्हे के साथ जो बैठा था. मगर इन सब  बातों को याद करना दुःख बढ़ाना जैसा होगा,वर्ना साथ बैठकर हम लोग उन पुरानी बातों पर कितना हँसते थे,आपका गुस्सा,फिर उसी झोंक में शीशे पे हाथ मारकर उसे तोड़ देना,शीशा तो टूट गया था पर आपके हाथ से रिसते खून की धार ने तो हम सबको परेशान  कर दिया था. इस बात पर मैंने आपको कितना चिढाया भी है. फुर्सत के उन तमाम क्षणों के अनगिनत किस्से,सब कुछ वैसे ही हैं अभी तक,उतने ही सुरक्षित,जैसे सब कल की ही बात तो है,मगर उन किताबों के बचे अधूरे पन्नों पर अब किस्से नहीं लिख पाएंगे,क्योंकि वो कलम टूट गयी, वो कहानी ख़तम हो गयी, और किस्से अधूरे ही रह गए।

Final year में आप चाहते थे ना की मैं आपके साथ  रहकर ही कॉलेज की पढाई करूँ,मगर मैं जनता था की ये साथ सिर्फ आप तक ही सीमित था, मैं आपसे एक लम्बे समय से नहीं मिल पाया,वर्ना मज़ाल थी की हम और आप बिना मिले  दो महीने गुज़ार लें।




ज़िन्दगी बड़ी है,जानता हूँ कट ही जायेगी,पर वो सब कुछ कहाँ से लाऊंगा जो हंसी ख़ुशी मस्ती आपके साथ सोच रखी थी।  सुबह कितनी हसीन थी,मैं शाम भी कुछ वैसी ही चाहता था,मगर ये हो न सका,इसे नज़र लग गयी,जाने किसकी?? एक ही झटके में नियति ने एक बेटा,एक भाई,एक देवर,चाचा,पिता,पति,दामाद,और मेरा सबसे अच्छा दोस्त छीन लिया।
इंतजार करूँ भी तो किसका?, जिसका आना अब संभव नहीं,मगर जाने क्यूँ कभी कभी अनायास ही चमत्कारों की उम्मीद करने लगता हूँ,किस्से-कहानियों में जिन पुनर्जन्मो की बातों पर मैं  हंसी उडाता था,अब उन पर यकीन करने लगा हूँ,कोरा  यकीन,और भैया, जानता हूँ आप अब कभी नहीं आयेंगे,कभी भी नहीं।  ज़िन्दगी के तमाम रास्ते आपसे बिना पूछे,बिना आपके साथ के,बिना कोई सीख लिए,बिना किसी मस्ती के, एक खालीपन सा समेटे,ऐसे ही तय करना होगा।  सभी को,जो आपसे जुड़े हैं।  मगर फिर भी एक उम्मीद है,ना जाने क्यों?, की इस संसार से परे कहीं और, भौतिकताओं से नृत,हम फिर मिलेंगे,जहाँ आप हैं,जहाँ मैं आऊंगा,और फिर से वही सारे पल-
वही खुशियाँ,वही मस्ती-
बंदिशों से दूर-
हंसी ठिठोली-
देर रात तक टीवी देखना-
स्टेशन की चाय-
रिक्शे की सवारी-
कार पर बैठकर प्रतापगढ़ की सैर-
बेला देवी दर्शन-
चिलबिला की रसमलाई-
और वो सब,
जो अधूरे रह गए"""

              हम फिर मिलेंगे
                        ज़रूर मिलेंगे। ……………… 

Saturday, 1 June 2013

सफ़र-अंतिम वेला इन चार सालों की

22 को जब परीक्षा के बाद बाहर आकर अपने चार सालों के खतम होने की ख़ुशी का इजहार करने लगे तो ऐसा लगा जैसे अनुभव के व्यक्तित्व को ओढ़े हमारे अन्दर अभी भी वही पुराना अनुभवहीन इंसान बसा है। यथार्थ की समझ हुई तो यकीन आया ये खुशियाँ नहीं गम थे,बी.टेक. खत्म,इंजीनियरिंग खत्म,पढाई खत्म,संघर्ष खत्म,मगर साथ ही साथ खत्म हुई ये मस्तियाँ,ये साथ का सफ़र,वो सब कुछ जो इन अंतरालों में हमने पाए,खोये,जिए,सँवारे,और निखारे।
                      14 सितम्बर 2009 को पहले साल का शुरू हुआ सफ़र इतनी जल्दी बीतेगा ,उम्मीद नहीं थी,पर समय के पंखों की उड़ान क्या मापना? एक-एक करके दिन गुजरे,साल बीतता गया,जीवन में उतार-चदाव का संगम बनता रहा,नए-नए दोस्त,नए तौर-तरीके,कभी सीखते थे,कभी सिखाया भी,कुछ को प्यार की मंजिलें मिल गयीं तो कुछ तलाश में भटकते रहे पर सबने इन्हें खुलकर जिया। यारी-दोस्ती,प्यार-मोहब्बत के सबके अपने-अपने तौर तरीके हैं और सबने उन्हें बखूबी निभाया। ज़िन्दगी जीना सही मायनों में यहीं सीखा था। एक मैगी में तीन शेयरिंग,600 ml की कोल्ड-ड्रिंक में आठ दावेदार,फिर भी कमियां महसूस नहीं हुई। होली की हुडदंग,दीवाली के पहले कैंपस का कश्मीर बन जाना,Fresher party की उत्सुकता और EPOQUE का उत्साह,कैसे भूल सकेगा कोई????? उतार चदाव आते गए,कभी मुश्किलों में किसी ने हमे संभाला,कभी खुशियों में हमने किसी को हिस्सेदारी दी और मुश्किलें आसान की। भाई-बहन-मां-बाप से परे भी रिश्ते इतने मजबूत होते हैं,यही पर समझ आई थी इस बात की........


                           पर अब अनुभव की इस दास्ताँ का अंत,वो सफ़र खतम हुआ,राहें अलग हो गयीं,मंजिलें अलग हैं,पथिक अनजान है/अकेला है। रात-रात भर एक दुसरे के कमरे में जाकर चर्चाएं खत्म,दोस्तों के नए नए क्रश बनाना खत्म,एक रूम में दो बेड  पर 7-8 लोगों का एक साथ बैठकर मिथुन की मूवीज देखना खत्म,दारु के नशे में सबको अपने पुराने राज बताना खत्म,बिन बात की पार्टीज खत्म,एक साथ घुमने का प्लान खत्म,
खत्म,खतम,
सब कुछ,शायद -  .....नहीं यकीनन, सब कुछ ख्त्म…………। 

कैसे लौटाएं अब इन पलों को???
क्या यही ये सफ़र था,बिछडना ही नयी मंजिलें ढूँढने का एकमात्र विकल्प है,अजीब रीतियाँ हैं ना????
पर यही सच है,सिर्फ चंद लम्हे और फिर सब कुछ सूना,ये हॉस्टल,ये कैंपस,यहाँ की गलियाँ,ये कैंटीन,ये दोस्त,ये पार्टी,सब सूनी हो जायंगी ...
अरसे बाद जब कभी वापस आयेंगे यहाँ तो राहों के सूखे पत्ते हमे हमारे पुराने होने का एहसास करायेंगे,राह चलते किसी चेहरे में किसी अपने को ढूँढने की कोशिश,पर निराशा। गलियों से होकर क्लास से गुजरते वक़्त झाँकने पर सुनसान से कमरे में फिर वही हसीं सुनाई देगी जो कभी पीछे बैठकर एक साथ हंसी थी,हर एक कोना हमे सजीव-निर्जीव के रिश्तों के जुड़ाव का एहसास कराएगा और हम मचल उठेंगे,फिट से उन पलों को जीने,उन्ही सबके साथ,उसी मैदान में,उसी घास पर,फिर वही अन्ताक्षरी,फिर वही .......
काश फिर से ………………. 
काश…. 




Saturday, 22 December 2012

सोच बदलिए,कपडे नहीं।

कुछ दिनों से चला आ रहा एक क्रांतिक मंजर अभी थमा नहीं है,थमना  भी नहीं चाहिए। आखिर सोये समाज को कैसे तो जगाना ही पड़ेगा। समाज के प्रगतिशील वर्ग के साथ आम जनता का जुड़कर इस तरह से अपनी बहन,बेटियों की सुरक्षा में सडको पर उतर आना वाकई इस बात का सूचक है की समाज को तथाकतित सुप्त कहने वाले होश में आयें,
     मैं उस 23 साल की मासूम के लिए किसी सहानुभूति की अपील के सम्बन्ध में नहीं लिख रहा हूँ। मेरा लिखना है उन लोगो तक ये बात पहुंचाने के लिए जो इस उभरते माहौल में एक राह से हटकर इस बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं की अगर उनके धर्म  के पदचिन्हों पर चलते तो ये दशा ना होती। एक बार फिर मैं ये बात कह रहा हूँ की मेरा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को आहत करना नहीं है। पर किसको क्या पहनना है,क्यों पहनना है,कैसे पहनना है ये फैसला करने का अधिकार किसी और को क्यों दिया जाए। क्या गारंटी है इस बात की कि कपडे से ढकी हुई किसी लड़की के साथ कभी रेप जैसी घटना नहीं हो सकती। और फिर सारे नियम लड़कियों के लिए ही क्यों। सिर्फ इसलिए क्योंकि वो शारीरिक शक्ति में पुरुषों से कमजोर मानी जाती है(यकीन मानिए ये सिर्फ सोच है,वास्तविकता नहीं )

अपनी राय अवश्य दें ताकि कुछ  विचार उन तथाकथित संकीर्णवादी विचारों को सही राह दिखा सकें।

सोच बदलने की जरुरत है, कपडे नहीं.............


सोच बदलिए,कपडे नहीं।

Sunday, 16 September 2012

काश ऐसे बदले ना होते!!!


वो मैदान की घास पर बैठकर हम
कभी दोस्तों संग,कभी बस अकेले 
वो मस्ती,ठिठोली,हँसाना और हँसना
वो दिन भर की सारी थकानें मिटाना
अगर साथ होते तो फिर से वहीँ पर
वो लम्हे पुराने जो गुजरे,बिताते
मगर साथ छूटा, तो फिर ना मिले तुम,
और अफ़सोस सारे हमे यूँ सताते,
सुलगता मेरा मन,जो आंसू सुखाकर
दिलाता मुझे याद सारे वो लम्हे.

थे तुम जो मेरे तब,वही आज होते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.......

हवाओं का रुख और मंजर बदलकर,
वो पत्ते सुकूं के कही दूर लेकर,
उड़े जो गगन में,तो पा ना सके हम
वो खुशियों के पल,एक पल भी जमीं पर
बिलखते हैं बरबस,वो सब याद करके
जो यादें नहीं एक पल थे अनोखे,
ना लौटेंगे पल वो,न लौटेंगी खुशियाँ
ना किस्से,कहानी,न प्यारी वो बतियाँ

तुम्हे इस तरह से कभी हम न खोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.....

वजह बेवजह थी,थे बेकार कारण
मगर मिल सका न उन्हें कुछ निवारण.
खुदगर्जी में खुद को पिरोते गए हम,
और उतना ही फिर दूर होते गए हम,
ना सोचा था हम पर भरोसा टिका है,
किसी का सभी कुछ हमी पर बिका है,
ना परवाह की और बढ़ते गए हम,
खुदी को जिताने में अड़ते गए हम,
वो नजदीकियां,दूरियाँ बन गयी जब,
तो अब जीत का जश्न कैसे मनाएं,
ये रंगत नयी सी है किस काम की अब,
जिन्हें खो चुका हूँ,उन्हें कैसे पाएं?

हसीं के नशीं परदे करके हैं रोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते........................

Thursday, 6 September 2012

जब साथ हमारे तुम ना थे

जब तुम ना थे
तो रास्ते इतने छोटे ना थे,
छोटी तो मेरी दुनिया थी,
जिसके एक छोटे कोने में,
मै घंटों बैठा रहता था,
और खुद से बातें करता था,

जैसे कोई परवाह नहीं,
मुझको  अपनी तन्हाई की,
जो बोझ थे मेरी फिक्रों के,
वो मेरे अपने रहे नहीं,
अपने छोटे से कमरे में,
बैठा दुनिया से दूर कहीं,
जैसे खुद का कोई ध्येय नहीं,
और नहीं पता क्या गलत-सही,

बस करता वो जो मन कहता,
खुद ही रोता,खुद ही हंसता,
जब बोर हुआ,  पढ़ लेता था,
खुद से खुद ही लड़ लेता था,
खुशियाँ भी नहीं,और गम भी ना थे,
जब साथ  हमारे तुम ना थे,

मैं रात-रात भर जागता था,
शायद तब खुद को ठगता था,
वो सदियों का एकाकीपन,
लगता था मेरा कोई वहम,
वो जगी रात के किस्से थे,
उन किस्सों के कुछ टुकड़ों में,
छोटे ही सही,मेरे हिस्से थे,
उन हिस्सों का हर एक कतरा
मजबूर मुझे कर देता था,
तुमको पाने की चाह में तुमसे,
दूर मुझे कर देता था,

थे निरुद्देश्य और भ्रम ना थे,
जब साथ हमारे तुम ना थे,
जब साथ तुम्हारे हम ना थे.......



Tuesday, 21 August 2012

चलो,आज दारू पीते हैं.....


हरिवंश राय बच्चन ने अपने पूरे जीवन में कभी शराब को हाथ नहीं लगाया मगर ताज्जुब होता है कि कैसे मधुशाला जैसी कृति मे
ं उन्होंने मधुशाला को जीवन के हर एक पहलू से जोड़कर हिंदी साहित्य के इतिहास को एक खुमारी से रूबरू कर दिया,
शराब मेरे लिए भी अभी तक उतनी ही अनजान वस्तु है, जितनी उनके लिए जीवन भर रही,
अंतर सिर्फ कृति कि महानता का है,
वो एक इतिहास बना
और ये दोस्तों के साथ के पल के यादों का दूर से देखा चित्रण... 
 
 
 

 जीवन की आपा-धापी में,
दौड़ भाग कर थक गए अब तो,
लम्हों के कतरे-कतरे में,
छोटी सी खुशियों के पल में,
बहुत रहे थे खुश हम,फिर भी
क्यूँ छाई बेचैनी ऐसी,
जैसे लगा,समय जो पाया,
उसमे भी कुछ खोते खोते,
और कुछ पाते सपनों जैसे,
अब उनसे कुछ वक़्त चुराकर,
एक नयी ज़िन्दगी जीते हैं,
चलो आज 'दारु ' पीते हैं.

वो सफ़ेद चादर सपनों की,
जिसके भीनेपन से होकर,
हमें चाँद तारे दिखते थे,
उन पर जाने के वो फैसले,
नए नए सपने देते थे,
पर अब धुंधलाई है छाई,
जैसे मेरी ही परछाईं,
पीछा क्यूँ करती है मेरा,
आखिर मेरे भी वजूद का
कहीं तो होगा एक बसेरा,
वो सपनों की चादर फट गयी,
उसे नशे में ही सीते हैं
चलो आज "दारु" पीते हैं.

प्यार मोहब्बत अफ़साने हैं,
झूठे ये ताने -बाने हैं,
एक मरीचिका से भ्रमवाहक
दुःख दर्दो के तराने हैं,
इंतज़ार के वो लम्बे पल
कट गए जाने कब ज़िन्दगी में,
बचे पलों में मै कहता हूँ,
झुका था बस तेरी बंदगी में,
कटे पलों का दर्द मिटाने,
चल कुछ पल ऐसे जीते हैं,
चलो ना यार,

आज दारु पीते हैं........