Dear प्रबोध भैया,
शायद पहली बार आपको आपके इस नाम से संबोधित कर रहा हूँ और ये आखिरी बार भी है. इसके बाद मैं आपसे कभी बात नहीं करूँगा,कभी सोचूंगा भी नहीं आपके बारे में, जानता हूँ ये थोडा मुश्किल है, बल्कि काफी मुश्किल है पर मैं पूरी कोशिश करूँगा, और फिर क्यूँ करूँ आपसे बात, क्यूँ सोचूं आपके बारे में?? आपने एक बार भी सोच कभी हम सबके बारे में?? कम से कम जय के बारे में सोचा होता। क्या होगा सबका?, कैसे कटेगी ये पहाड़ भरी ज़िन्दगी?, सिर्फ आपकी यादों के सहारे?, जिसमे आपके लौट आने की कोई उम्मीद नहीं है, तो फिर किसका सहारा??
भैया, आप इस तरह से हमे छोड़कर कैसे चले गए?, मुझे बहुत अकेलापन महसूस हो रहा है, सभी लोग हैं आसपास, सभी लोग, पर फिर भी एक कमी है,जिसे कोई पूरा नहीं कर सकता,कोई भी नहीं। आपको याद है, हमारी पहली मुलाक़ात ,जब आप मेरी दीदी यानी अपनी भाभी को देखने पूजा भाभी के यहाँ आये थे. तब पहली बार आपको देखा , गले में तौलिया डाले आप एक टिपिकल सा लुक दे रहे थे पर जब आपसे बात हुई तो आपकी बातचीत का तरीका देखकर मैं कायल हो गया. इस चीज में मैं हमेशा आपसे प्रभावित रहा हूँ और सच कहूँ तो बातचीत का तरीका आपसे ही सिखा है मैंने।
दीदी की शादी के बाद जब पहली बार गया था दिल्ली तो कितना परेशान किया था न आपको? मेरे लिए उस समय लैपटॉप,मल्टीमीडिया फोन, टच स्क्रीन, सब नयी बात थी, और मैं कभी ये,कभी वो में आपको खूब झिलाता था. पर फिर भी बिना झल्लाये आप वो सब कर देते थे. उसके बाद से तो आप मेरे चहेते बन गए थे. आपको याद है,कॉलेज आने से पहले जब मैं प्रतापगढ़ गया था तो आपके साथ कितनी मौज की थी, उस समय गर्मी चरम पर थी और प्रतापगढ़ में बिजली की किल्लत,पर हम लोग उस गर्मी में भी रात के 2 बजे स्टेशन जाकर चाय पीते थे,फिर वापसी में आपकी रिक्शे से आने की जिद और मेरा आपको पैदल खींचकर ले जाना,कितना खुश रहते थे हम उस बेहाल गर्मी में भी. सुबह के 4-5 बजे सोना और फिर दिन-दोपहरी उठना। भले ही हॉस्टल आकर ये मेरा रोज का क्रम बन गया था मगर उस समय ये सब एक नया अनुभव था मेरे लिए.
मेरी पहली रैगिंग आपके द्वारा ही हुई थी,मैं हंस रहा था और तभी एक वेल-ट्रेंड-फ्रस्टेटेड-सीनियर की तरह आपकी डांट, जानता हूँ वो सब आपकी ट्रेनिंग का हिस्सा था पर तब मुझे थोडा खराब लगा था,क्या करूँ? छोटा था ना, बिलकुल आपके नाम की तरह. आज तरस रहा हूँ, उसी डांट के लिए,उसी ट्रेनिंग को,वही रात,स्टेशन की वही चाय,पर अब अकेला हूँ,बिलकुल अकेला। ….
गाज़ियाबाद आने के बाद मेरा घर आना काफी हो गया था,और घर आने के रास्ते भर सोचता रहता की आपसे Computer Related कुछ सीखूंगा पर हमारी BC से हमे फुर्सत मिलती तब ना,वापस हॉस्टल लौटते समय हमेशा ही दुखी रहता, सबसे ज्यादा आपसे और नील से बिछड़ने का गम.…
क्रेज़िनेस तो जैसे कूट-कूटकर भरी थी आपमें। याद है-दीदी की शादी के बाद की पहली होली, आप दिल्ली से कानपुर ठिठुरती ठण्ड में रातभर बाइक चलाकर आये थे, रातभर में ही कितना परेशान थे हम लोग, और सुबह जब दरवाज़े पे आपने दस्तक दी तब जाकर चैन मिला हम सबको। हमारी एक साथ पहली और अब आखिरी होली। … हम लोग पापा की वही पुरानी बाइक पर कानपुर घूमने निकले थे,और जब बाइक पंक्चर हो गयी थी तो धक्का लगाकर वापस घर आये थे, होली की वजह से कोई दुकान भी तो नहीं खुली थी. और फिर शाम को जे. के. मंदिर के दर्शन के समय की तमाम मस्तियाँ।
आप सच में कभी अकेले तो घर आये ही नहीं, जब भी आये तमाम खुशियाँ ,ढेरों मस्ती और छोटी-छोटी सीख लाये उन्हें हमारी ज़िन्दगी में उपहार स्वरुप दे दिया और फिर से अपने आशियाने की ओर उड़ गये. वो उड़ान क्षणिक थी मगर ये ?? इस तरह से सब कुछ छोड़कर चले जाना, ये चीज तो नहीं थी ना आपमें। मगर भैया,अब करूँ भी तो क्या? आप होते तो आपको मारता,चीखता,चिल्लाता आप पर,और पूछता की आखिर क्यों? क्या इस तरह से एक बार भी ख्याल नहीं आया अपने पापा का,मम्मी का,भैया,भाभी,जय, और जान से प्यारे अपने भतीजे का?? अरे नील को तो अभी पता भी नहीं आपके बारे में, वो तो इस उम्मीद में है की उसके चाचा अभी दिल्ली में हैं,और अभी उसके जन्मदिन पर उसके लिए एक अच्छा सा गिफ्ट लाकर उसे देंगे। अब आइये,लाइए,और दीजिये ना गिफ्ट, बड़ा शौक था न आपको सबको खुश रखने का,अब रखिये खुश. ।
नवम्बर में जब आप अपना रूम शिफ्ट कर रहे थे तो जाने कितनी बार बुलाया था आपने मुझे पर पेपरों के चक्कर में मैं नहीं आ पाया था, 9 महीने बाद उसी घर से इस कदर वो सारा सामान शिफ्ट करना पड़ेगा,कभी ज़िन्दगी में नहीं सोचा था. भैया,वो घर आबाद था,पर वीराना लगता है,उस कमरे की हर एक चीज जैसे आपका बिम्ब लगती थी, वहां की छोटी सी कील को भी समेटकर रखा है,उसमे आप बसे हैं,आपसे जुडा हर एक पल सजा है उसमे। आप होते तो ये सब कभी ना देख पाते,उस भाई को,जिसने आपको हमेशा छोटे भाई की तरह माना,उन सामानों को अपने आंसुओं तले समेटते हुए, अपनी भाभी को अपने भाई से भी ज्यादा प्यारे देवर की हर एक चीज सहेजकर,उसे छूकर,देखकर,और मन ही मन जाने कितना रो रहे थे सब. अरे,नील को तो पता भी नहीं था की हम सब वहां गए क्यूँ हैं?,ये सारा सामान किसका है?,और क्यूँ इस तरह से जा रहा है??
भैया,मैंने जीजाजी को मन ही मन रोते देखा,दुःख जब अतिरेक में पहुच जाता तो अपनी आँखें बड़ी करके जैसे सारा कुछ उसी में समेटने की कोशिश करते,चेहरे पर स्थितियों और भावनाओं का द्वन्द लिए,हर संभव प्रयास अपने आँसू छिपाने का,लेकिन आखिरकार वो ज्वार भी फूटा,मेरे लिए ये सब देख पाना बहुत ही मुश्किल था. मैं खुद उस घर में रोया,ज़िन्दगी में पहली बार इतना,क्षण-प्रतिक्षण रोकना मुश्किल होता था खुद को,क्या करूँ?/ ज़िन्दगी में इतना लगाव किसी से रहा भी नहीं था भैया।।
आपकी शादी की तमाम यादें याद आती थी,आपके साथ आपकी ही गाडी में बैठकर गए थे हम तो,रास्ते भर कितना special सा एहसास हो रहा था मुझे,भई दुल्हे के साथ जो बैठा था. मगर इन सब बातों को याद करना दुःख बढ़ाना जैसा होगा,वर्ना साथ बैठकर हम लोग उन पुरानी बातों पर कितना हँसते थे,आपका गुस्सा,फिर उसी झोंक में शीशे पे हाथ मारकर उसे तोड़ देना,शीशा तो टूट गया था पर आपके हाथ से रिसते खून की धार ने तो हम सबको परेशान कर दिया था. इस बात पर मैंने आपको कितना चिढाया भी है. फुर्सत के उन तमाम क्षणों के अनगिनत किस्से,सब कुछ वैसे ही हैं अभी तक,उतने ही सुरक्षित,जैसे सब कल की ही बात तो है,मगर उन किताबों के बचे अधूरे पन्नों पर अब किस्से नहीं लिख पाएंगे,क्योंकि वो कलम टूट गयी, वो कहानी ख़तम हो गयी, और किस्से अधूरे ही रह गए।
Final year में आप चाहते थे ना की मैं आपके साथ रहकर ही कॉलेज की पढाई करूँ,मगर मैं जनता था की ये साथ सिर्फ आप तक ही सीमित था, मैं आपसे एक लम्बे समय से नहीं मिल पाया,वर्ना मज़ाल थी की हम और आप बिना मिले दो महीने गुज़ार लें।
ज़िन्दगी बड़ी है,जानता हूँ कट ही जायेगी,पर वो सब कुछ कहाँ से लाऊंगा जो हंसी ख़ुशी मस्ती आपके साथ सोच रखी थी। सुबह कितनी हसीन थी,मैं शाम भी कुछ वैसी ही चाहता था,मगर ये हो न सका,इसे नज़र लग गयी,जाने किसकी?? एक ही झटके में नियति ने एक बेटा,एक भाई,एक देवर,चाचा,पिता,पति,दामाद,और मेरा सबसे अच्छा दोस्त छीन लिया।
इंतजार करूँ भी तो किसका?, जिसका आना अब संभव नहीं,मगर जाने क्यूँ कभी कभी अनायास ही चमत्कारों की उम्मीद करने लगता हूँ,किस्से-कहानियों में जिन पुनर्जन्मो की बातों पर मैं हंसी उडाता था,अब उन पर यकीन करने लगा हूँ,कोरा यकीन,और भैया, जानता हूँ आप अब कभी नहीं आयेंगे,कभी भी नहीं। ज़िन्दगी के तमाम रास्ते आपसे बिना पूछे,बिना आपके साथ के,बिना कोई सीख लिए,बिना किसी मस्ती के, एक खालीपन सा समेटे,ऐसे ही तय करना होगा। सभी को,जो आपसे जुड़े हैं। मगर फिर भी एक उम्मीद है,ना जाने क्यों?, की इस संसार से परे कहीं और, भौतिकताओं से नृत,हम फिर मिलेंगे,जहाँ आप हैं,जहाँ मैं आऊंगा,और फिर से वही सारे पल-
वही खुशियाँ,वही मस्ती-
बंदिशों से दूर-
हंसी ठिठोली-
देर रात तक टीवी देखना-
स्टेशन की चाय-
रिक्शे की सवारी-
कार पर बैठकर प्रतापगढ़ की सैर-
बेला देवी दर्शन-
चिलबिला की रसमलाई-
और वो सब,
जो अधूरे रह गए"""
हम फिर मिलेंगे
ज़रूर मिलेंगे। ………………