जब तुम ना थे
तो रास्ते इतने छोटे ना थे,
छोटी तो मेरी दुनिया थी,
जिसके एक छोटे कोने में,
मै घंटों बैठा रहता था,
और खुद से बातें करता था,
जैसे कोई परवाह नहीं,
मुझको अपनी तन्हाई की,
जो बोझ थे मेरी फिक्रों के,
वो मेरे अपने रहे नहीं,
अपने छोटे से कमरे में,
बैठा दुनिया से दूर कहीं,
जैसे खुद का कोई ध्येय नहीं,
और नहीं पता क्या गलत-सही,
बस करता वो जो मन कहता,
खुद ही रोता,खुद ही हंसता,
जब बोर हुआ, पढ़ लेता था,
खुद से खुद ही लड़ लेता था,
खुशियाँ भी नहीं,और गम भी ना थे,
जब साथ हमारे तुम ना थे,
मैं रात-रात भर जागता था,
शायद तब खुद को ठगता था,
वो सदियों का एकाकीपन,
लगता था मेरा कोई वहम,
वो जगी रात के किस्से थे,
उन किस्सों के कुछ टुकड़ों में,
छोटे ही सही,मेरे हिस्से थे,
उन हिस्सों का हर एक कतरा
मजबूर मुझे कर देता था,
तुमको पाने की चाह में तुमसे,
दूर मुझे कर देता था,
थे निरुद्देश्य और भ्रम ना थे,
जब साथ हमारे तुम ना थे,
जब साथ तुम्हारे हम ना थे.......
तो रास्ते इतने छोटे ना थे,
छोटी तो मेरी दुनिया थी,
जिसके एक छोटे कोने में,
मै घंटों बैठा रहता था,
और खुद से बातें करता था,
जैसे कोई परवाह नहीं,
मुझको अपनी तन्हाई की,
जो बोझ थे मेरी फिक्रों के,
वो मेरे अपने रहे नहीं,
अपने छोटे से कमरे में,
बैठा दुनिया से दूर कहीं,
जैसे खुद का कोई ध्येय नहीं,
और नहीं पता क्या गलत-सही,
बस करता वो जो मन कहता,
खुद ही रोता,खुद ही हंसता,
जब बोर हुआ, पढ़ लेता था,
खुद से खुद ही लड़ लेता था,
खुशियाँ भी नहीं,और गम भी ना थे,
जब साथ हमारे तुम ना थे,
मैं रात-रात भर जागता था,
शायद तब खुद को ठगता था,
वो सदियों का एकाकीपन,
लगता था मेरा कोई वहम,
वो जगी रात के किस्से थे,
उन किस्सों के कुछ टुकड़ों में,
छोटे ही सही,मेरे हिस्से थे,
उन हिस्सों का हर एक कतरा
मजबूर मुझे कर देता था,
तुमको पाने की चाह में तुमसे,
दूर मुझे कर देता था,
थे निरुद्देश्य और भ्रम ना थे,
जब साथ हमारे तुम ना थे,
जब साथ तुम्हारे हम ना थे.......
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