कुछ दिनों से चला आ रहा एक क्रांतिक मंजर अभी थमा नहीं है,थमना भी नहीं चाहिए। आखिर सोये समाज को कैसे तो जगाना ही पड़ेगा। समाज के प्रगतिशील वर्ग के साथ आम जनता का जुड़कर इस तरह से अपनी बहन,बेटियों की सुरक्षा में सडको पर उतर आना वाकई इस बात का सूचक है की समाज को तथाकतित सुप्त कहने वाले होश में आयें,
मैं उस 23 साल की मासूम के लिए किसी सहानुभूति की अपील के सम्बन्ध में नहीं लिख रहा हूँ। मेरा लिखना है उन लोगो तक ये बात पहुंचाने के लिए जो इस उभरते माहौल में एक राह से हटकर इस बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं की अगर उनके धर्म के पदचिन्हों पर चलते तो ये दशा ना होती। एक बार फिर मैं ये बात कह रहा हूँ की मेरा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को आहत करना नहीं है। पर किसको क्या पहनना है,क्यों पहनना है,कैसे पहनना है ये फैसला करने का अधिकार किसी और को क्यों दिया जाए। क्या गारंटी है इस बात की कि कपडे से ढकी हुई किसी लड़की के साथ कभी रेप जैसी घटना नहीं हो सकती। और फिर सारे नियम लड़कियों के लिए ही क्यों। सिर्फ इसलिए क्योंकि वो शारीरिक शक्ति में पुरुषों से कमजोर मानी जाती है(यकीन मानिए ये सिर्फ सोच है,वास्तविकता नहीं )
अपनी राय अवश्य दें ताकि कुछ विचार उन तथाकथित संकीर्णवादी विचारों को सही राह दिखा सकें।
सोच बदलने की जरुरत है, कपडे नहीं.............
सोच बदलिए,कपडे नहीं।
मैं उस 23 साल की मासूम के लिए किसी सहानुभूति की अपील के सम्बन्ध में नहीं लिख रहा हूँ। मेरा लिखना है उन लोगो तक ये बात पहुंचाने के लिए जो इस उभरते माहौल में एक राह से हटकर इस बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं की अगर उनके धर्म के पदचिन्हों पर चलते तो ये दशा ना होती। एक बार फिर मैं ये बात कह रहा हूँ की मेरा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को आहत करना नहीं है। पर किसको क्या पहनना है,क्यों पहनना है,कैसे पहनना है ये फैसला करने का अधिकार किसी और को क्यों दिया जाए। क्या गारंटी है इस बात की कि कपडे से ढकी हुई किसी लड़की के साथ कभी रेप जैसी घटना नहीं हो सकती। और फिर सारे नियम लड़कियों के लिए ही क्यों। सिर्फ इसलिए क्योंकि वो शारीरिक शक्ति में पुरुषों से कमजोर मानी जाती है(यकीन मानिए ये सिर्फ सोच है,वास्तविकता नहीं )
अपनी राय अवश्य दें ताकि कुछ विचार उन तथाकथित संकीर्णवादी विचारों को सही राह दिखा सकें।
सोच बदलने की जरुरत है, कपडे नहीं.............
सोच बदलिए,कपडे नहीं।