Saturday, 22 December 2012

सोच बदलिए,कपडे नहीं।

कुछ दिनों से चला आ रहा एक क्रांतिक मंजर अभी थमा नहीं है,थमना  भी नहीं चाहिए। आखिर सोये समाज को कैसे तो जगाना ही पड़ेगा। समाज के प्रगतिशील वर्ग के साथ आम जनता का जुड़कर इस तरह से अपनी बहन,बेटियों की सुरक्षा में सडको पर उतर आना वाकई इस बात का सूचक है की समाज को तथाकतित सुप्त कहने वाले होश में आयें,
     मैं उस 23 साल की मासूम के लिए किसी सहानुभूति की अपील के सम्बन्ध में नहीं लिख रहा हूँ। मेरा लिखना है उन लोगो तक ये बात पहुंचाने के लिए जो इस उभरते माहौल में एक राह से हटकर इस बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं की अगर उनके धर्म  के पदचिन्हों पर चलते तो ये दशा ना होती। एक बार फिर मैं ये बात कह रहा हूँ की मेरा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को आहत करना नहीं है। पर किसको क्या पहनना है,क्यों पहनना है,कैसे पहनना है ये फैसला करने का अधिकार किसी और को क्यों दिया जाए। क्या गारंटी है इस बात की कि कपडे से ढकी हुई किसी लड़की के साथ कभी रेप जैसी घटना नहीं हो सकती। और फिर सारे नियम लड़कियों के लिए ही क्यों। सिर्फ इसलिए क्योंकि वो शारीरिक शक्ति में पुरुषों से कमजोर मानी जाती है(यकीन मानिए ये सिर्फ सोच है,वास्तविकता नहीं )

अपनी राय अवश्य दें ताकि कुछ  विचार उन तथाकथित संकीर्णवादी विचारों को सही राह दिखा सकें।

सोच बदलने की जरुरत है, कपडे नहीं.............


सोच बदलिए,कपडे नहीं।

Sunday, 16 September 2012

काश ऐसे बदले ना होते!!!


वो मैदान की घास पर बैठकर हम
कभी दोस्तों संग,कभी बस अकेले 
वो मस्ती,ठिठोली,हँसाना और हँसना
वो दिन भर की सारी थकानें मिटाना
अगर साथ होते तो फिर से वहीँ पर
वो लम्हे पुराने जो गुजरे,बिताते
मगर साथ छूटा, तो फिर ना मिले तुम,
और अफ़सोस सारे हमे यूँ सताते,
सुलगता मेरा मन,जो आंसू सुखाकर
दिलाता मुझे याद सारे वो लम्हे.

थे तुम जो मेरे तब,वही आज होते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.......

हवाओं का रुख और मंजर बदलकर,
वो पत्ते सुकूं के कही दूर लेकर,
उड़े जो गगन में,तो पा ना सके हम
वो खुशियों के पल,एक पल भी जमीं पर
बिलखते हैं बरबस,वो सब याद करके
जो यादें नहीं एक पल थे अनोखे,
ना लौटेंगे पल वो,न लौटेंगी खुशियाँ
ना किस्से,कहानी,न प्यारी वो बतियाँ

तुम्हे इस तरह से कभी हम न खोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.....

वजह बेवजह थी,थे बेकार कारण
मगर मिल सका न उन्हें कुछ निवारण.
खुदगर्जी में खुद को पिरोते गए हम,
और उतना ही फिर दूर होते गए हम,
ना सोचा था हम पर भरोसा टिका है,
किसी का सभी कुछ हमी पर बिका है,
ना परवाह की और बढ़ते गए हम,
खुदी को जिताने में अड़ते गए हम,
वो नजदीकियां,दूरियाँ बन गयी जब,
तो अब जीत का जश्न कैसे मनाएं,
ये रंगत नयी सी है किस काम की अब,
जिन्हें खो चुका हूँ,उन्हें कैसे पाएं?

हसीं के नशीं परदे करके हैं रोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते........................

Thursday, 6 September 2012

जब साथ हमारे तुम ना थे

जब तुम ना थे
तो रास्ते इतने छोटे ना थे,
छोटी तो मेरी दुनिया थी,
जिसके एक छोटे कोने में,
मै घंटों बैठा रहता था,
और खुद से बातें करता था,

जैसे कोई परवाह नहीं,
मुझको  अपनी तन्हाई की,
जो बोझ थे मेरी फिक्रों के,
वो मेरे अपने रहे नहीं,
अपने छोटे से कमरे में,
बैठा दुनिया से दूर कहीं,
जैसे खुद का कोई ध्येय नहीं,
और नहीं पता क्या गलत-सही,

बस करता वो जो मन कहता,
खुद ही रोता,खुद ही हंसता,
जब बोर हुआ,  पढ़ लेता था,
खुद से खुद ही लड़ लेता था,
खुशियाँ भी नहीं,और गम भी ना थे,
जब साथ  हमारे तुम ना थे,

मैं रात-रात भर जागता था,
शायद तब खुद को ठगता था,
वो सदियों का एकाकीपन,
लगता था मेरा कोई वहम,
वो जगी रात के किस्से थे,
उन किस्सों के कुछ टुकड़ों में,
छोटे ही सही,मेरे हिस्से थे,
उन हिस्सों का हर एक कतरा
मजबूर मुझे कर देता था,
तुमको पाने की चाह में तुमसे,
दूर मुझे कर देता था,

थे निरुद्देश्य और भ्रम ना थे,
जब साथ हमारे तुम ना थे,
जब साथ तुम्हारे हम ना थे.......



Tuesday, 21 August 2012

चलो,आज दारू पीते हैं.....


हरिवंश राय बच्चन ने अपने पूरे जीवन में कभी शराब को हाथ नहीं लगाया मगर ताज्जुब होता है कि कैसे मधुशाला जैसी कृति मे
ं उन्होंने मधुशाला को जीवन के हर एक पहलू से जोड़कर हिंदी साहित्य के इतिहास को एक खुमारी से रूबरू कर दिया,
शराब मेरे लिए भी अभी तक उतनी ही अनजान वस्तु है, जितनी उनके लिए जीवन भर रही,
अंतर सिर्फ कृति कि महानता का है,
वो एक इतिहास बना
और ये दोस्तों के साथ के पल के यादों का दूर से देखा चित्रण... 
 
 
 

 जीवन की आपा-धापी में,
दौड़ भाग कर थक गए अब तो,
लम्हों के कतरे-कतरे में,
छोटी सी खुशियों के पल में,
बहुत रहे थे खुश हम,फिर भी
क्यूँ छाई बेचैनी ऐसी,
जैसे लगा,समय जो पाया,
उसमे भी कुछ खोते खोते,
और कुछ पाते सपनों जैसे,
अब उनसे कुछ वक़्त चुराकर,
एक नयी ज़िन्दगी जीते हैं,
चलो आज 'दारु ' पीते हैं.

वो सफ़ेद चादर सपनों की,
जिसके भीनेपन से होकर,
हमें चाँद तारे दिखते थे,
उन पर जाने के वो फैसले,
नए नए सपने देते थे,
पर अब धुंधलाई है छाई,
जैसे मेरी ही परछाईं,
पीछा क्यूँ करती है मेरा,
आखिर मेरे भी वजूद का
कहीं तो होगा एक बसेरा,
वो सपनों की चादर फट गयी,
उसे नशे में ही सीते हैं
चलो आज "दारु" पीते हैं.

प्यार मोहब्बत अफ़साने हैं,
झूठे ये ताने -बाने हैं,
एक मरीचिका से भ्रमवाहक
दुःख दर्दो के तराने हैं,
इंतज़ार के वो लम्बे पल
कट गए जाने कब ज़िन्दगी में,
बचे पलों में मै कहता हूँ,
झुका था बस तेरी बंदगी में,
कटे पलों का दर्द मिटाने,
चल कुछ पल ऐसे जीते हैं,
चलो ना यार,

आज दारु पीते हैं........

Thursday, 7 June 2012

वो चले गए........

आज (6 मई ) की सुबह कुछ अजीब थी. मै आठ बजे सोकर उठा था ,और वो भी तब जब कॉलेज जाने की कोई जल्दी नहीं थी. ये खुद अपने आप में अजीब था,मेरे लिए. बिस्तर पर लेटे-लेटे जब आराम को भी पूरा आराम मिल गया तो मै उठा,बेड के नीचे से चप्पल खिसकाकर पहनी,और कमरे से बाहर निकला. मेरे कमरे वाली गली सुनसान थी,एक अजीब सी शांति थी वहां,जैसे बिछड जाने की व्यथा के बाद मन सिर्फ सुनता है,एक खामोशी. कुछ वैसा ही मंजर था वहां. ये गलियाँ ऐसी तो कभी नहीं रहीं, सुबह से ही चहल कदमी शुरू हो जाती,कोई भगवान् प्रेमी नहा-धोकर पूजा-पाठ करने लगता,कोई किसी की मौज ले रहा होता,कभी रात के हैंगओवर की बातें,तो कभी किसी की माँ-बहन सम्बन्धी आपत्तिजनक शब्दों को बिना किसी आपत्ति के प्रयोग करना,एक क्रम सा बन गया था जैसे. इसी शोर की आदत हो गयी थी,पर आज यहाँ इतनी शांति ,जैसे शून्यता अपने चरम पर आकर और भी ऊपर जाना चाहती है. 
                     इस शांति में भी एक शोर है जो मुझे विचलित कर देता है. उन सबसे बिछड जाने का जो मेरे बड़े भाई की तरह थे,अच्छे दोस्त की तरह,एक सच्चे साथी की तरह,वों मेरे सीनिअर्स थे. बीते पलों में जाता हूँ तो लगता है जैसे अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है. कैम्पस प्लेसमेंट की भागादौड़ी,फिर नौकरी लगने की खुशी,पार्टी,रात-रात भर जागकर पीना,फिर अपनी वाली का नाम बताकर इमोशनल हो जाना,साथ में बैठकर हँसना-रोना,GATE के लिए जी-जान से मेहनत करना,सब जैसे अभी की बात है. कुछ लम्हों में मै साथ था उनके और कुछ में नहीं,पर तटस्थ रहकर इनको देखना भी एक सुकून था,जैसे मै खुद उसे जी रहा हूँ. इन्ही लोगों के साथ रात में सिद्धार्थ जाकर चाय पीना,ताश खेलकर रात गुजारना,कभी-कभी रात में भूतों की बात करके डरवा देना,पेपर के पहले भी बेफिक्री से जीने की आदत,मैंने जैसे एक नया संसार देखकर उसमे जीने की आदत डाल ली थी.
      
            पर आज फिर वही एकाकीपन छा गया है, जेब में पैसे हैं,पर सिद्दार्थ जाने का साथ नहीं है,डर ख़तम है,पर भूतों की बात करने वाला कोई नहीं,गाने हैं,स्पीकर है,पर उन पर डांस करके थिरकने वाला कोई नहीं,ताश की नयी गड्डी है,पर खेलने वालों का साथ चला गया. आप सब जा चुके हैं. इनके खाली कमरों में जाता हूँ तो वही हंसी,वही मस्ती,वही पार्टी याद आती है जो किसी कोने में बैठकर इन्जॉय की थी. यादों से जुड़े इन्ही एक कमरों में मै अपना आगे का सफ़र तय करूँगा,इससे जुडी हर एक याद को समेटे हुए.

आप सब अपना मुकाम पाएं,आगे बढे और एक बुनियाद कड़ी करें जिसपर बनी हर एक इमारत उतनी ही हसीं हो जितनी कभी आपकी कल्पनाओं में रही थी. आगे का सफ़र दोस्तों के साथ एक सीनिअर बनकर,बिना किसी की मदद के तय करना है,ज़िन्दगी का सफर कभी रुकता नहीं
अब तो बस चलते जाना है,
                 चलते जाना है..............