Sunday, 16 September 2012

काश ऐसे बदले ना होते!!!


वो मैदान की घास पर बैठकर हम
कभी दोस्तों संग,कभी बस अकेले 
वो मस्ती,ठिठोली,हँसाना और हँसना
वो दिन भर की सारी थकानें मिटाना
अगर साथ होते तो फिर से वहीँ पर
वो लम्हे पुराने जो गुजरे,बिताते
मगर साथ छूटा, तो फिर ना मिले तुम,
और अफ़सोस सारे हमे यूँ सताते,
सुलगता मेरा मन,जो आंसू सुखाकर
दिलाता मुझे याद सारे वो लम्हे.

थे तुम जो मेरे तब,वही आज होते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.......

हवाओं का रुख और मंजर बदलकर,
वो पत्ते सुकूं के कही दूर लेकर,
उड़े जो गगन में,तो पा ना सके हम
वो खुशियों के पल,एक पल भी जमीं पर
बिलखते हैं बरबस,वो सब याद करके
जो यादें नहीं एक पल थे अनोखे,
ना लौटेंगे पल वो,न लौटेंगी खुशियाँ
ना किस्से,कहानी,न प्यारी वो बतियाँ

तुम्हे इस तरह से कभी हम न खोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले ना होते.....

वजह बेवजह थी,थे बेकार कारण
मगर मिल सका न उन्हें कुछ निवारण.
खुदगर्जी में खुद को पिरोते गए हम,
और उतना ही फिर दूर होते गए हम,
ना सोचा था हम पर भरोसा टिका है,
किसी का सभी कुछ हमी पर बिका है,
ना परवाह की और बढ़ते गए हम,
खुदी को जिताने में अड़ते गए हम,
वो नजदीकियां,दूरियाँ बन गयी जब,
तो अब जीत का जश्न कैसे मनाएं,
ये रंगत नयी सी है किस काम की अब,
जिन्हें खो चुका हूँ,उन्हें कैसे पाएं?

हसीं के नशीं परदे करके हैं रोते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते,
कि यूँ काश हम ऐसे बदले न होते........................

Thursday, 6 September 2012

जब साथ हमारे तुम ना थे

जब तुम ना थे
तो रास्ते इतने छोटे ना थे,
छोटी तो मेरी दुनिया थी,
जिसके एक छोटे कोने में,
मै घंटों बैठा रहता था,
और खुद से बातें करता था,

जैसे कोई परवाह नहीं,
मुझको  अपनी तन्हाई की,
जो बोझ थे मेरी फिक्रों के,
वो मेरे अपने रहे नहीं,
अपने छोटे से कमरे में,
बैठा दुनिया से दूर कहीं,
जैसे खुद का कोई ध्येय नहीं,
और नहीं पता क्या गलत-सही,

बस करता वो जो मन कहता,
खुद ही रोता,खुद ही हंसता,
जब बोर हुआ,  पढ़ लेता था,
खुद से खुद ही लड़ लेता था,
खुशियाँ भी नहीं,और गम भी ना थे,
जब साथ  हमारे तुम ना थे,

मैं रात-रात भर जागता था,
शायद तब खुद को ठगता था,
वो सदियों का एकाकीपन,
लगता था मेरा कोई वहम,
वो जगी रात के किस्से थे,
उन किस्सों के कुछ टुकड़ों में,
छोटे ही सही,मेरे हिस्से थे,
उन हिस्सों का हर एक कतरा
मजबूर मुझे कर देता था,
तुमको पाने की चाह में तुमसे,
दूर मुझे कर देता था,

थे निरुद्देश्य और भ्रम ना थे,
जब साथ हमारे तुम ना थे,
जब साथ तुम्हारे हम ना थे.......