ज़माने की तंग गलियों में भटकते-भटकते ही अकेला जब कभी,
सुकूं के दो पल मिलते हैं,
तब याद आता है वो बीता हुआ पल
जो आगे भी चलेगा, यूँ ही हमेशा, निरंतर,
एक हलकी सी मुस्कान, जो अनायास ही आ जाती है,
जो बताती है, की दोस्ती का वो रिश्ता आज भी कायम है,
और उन्ही भूली-बिसरी यादों के पन्ने पलट जाते हैं,
और एक एक कर तुम सबके चेहरे सामने आते हैं,
फिर वही पुराना ख़याल
कि
भले ही दूर हों, मंजिलों को पाने में थक कर चूर हों
मगर वो एहसास हमारी दोस्ती का आज भी जिंदा है और रहेगा,
एहसास,
तुम सबके संग खुशियाँ मनाने का, गम में साथ बैठकर ग़मगीन हो जाने का,
साथ में बैठकर क्लास की आखिरी बेंच पर, टीचर को Moral & Atticates सिखाने का,
कॉलेज की लड़की में कौन सी भाभी है हमारी, ये साथ बैठकर बताने का,
और बाद में उसके किसी और से पट जाने पर तमाम तरीकों से उसे गरियाने का,
जन्मदिन पर केक काटने से पहले पीटने और पिटवाने का,
फिर पार्टी के नाम पर मेनू की सबसे महंगी चीज आर्डर करवाने का,
सेमेस्टर से पहले की रात इधर उधर घूमकर सब कुछ निपटाने का,
बचा खुचा एग्जाम में खुद ही derive करवाने का,
एहसास,
उन आखिरी दिनों में बात बात पर भावुक होने
और फिर मिलेंगे इस बात के वादे,
मगर वो वादे ही होते हैं शायद, जो निभाये नहीं जाते हैं ,
मगर ये ख़ूबसूरत एहसास कभी जो बिछड नहीं पाते हैं ,
बस उन्ही के झरोखों से जब देखो कभी
तो सारे के सारे ही याद आते हैं,
एहसास उन्ही खूबसूरत बानगी का,
जो आज भी है,और रहेगा, हमेशा, यूँही, निरंतर..........


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