22 को जब परीक्षा के बाद बाहर आकर अपने चार सालों के खतम होने की ख़ुशी का इजहार करने लगे तो ऐसा लगा जैसे अनुभव के व्यक्तित्व को ओढ़े हमारे अन्दर अभी भी वही पुराना अनुभवहीन इंसान बसा है। यथार्थ की समझ हुई तो यकीन आया ये खुशियाँ नहीं गम थे,बी.टेक. खत्म,इंजीनियरिंग खत्म,पढाई खत्म,संघर्ष खत्म,मगर साथ ही साथ खत्म हुई ये मस्तियाँ,ये साथ का सफ़र,वो सब कुछ जो इन अंतरालों में हमने पाए,खोये,जिए,सँवारे,और निखारे।
14 सितम्बर 2009 को पहले साल का शुरू हुआ सफ़र इतनी जल्दी बीतेगा ,उम्मीद नहीं थी,पर समय के पंखों की उड़ान क्या मापना? एक-एक करके दिन गुजरे,साल बीतता गया,जीवन में उतार-चदाव का संगम बनता रहा,नए-नए दोस्त,नए तौर-तरीके,कभी सीखते थे,कभी सिखाया भी,कुछ को प्यार की मंजिलें मिल गयीं तो कुछ तलाश में भटकते रहे पर सबने इन्हें खुलकर जिया। यारी-दोस्ती,प्यार-मोहब्बत के सबके अपने-अपने तौर तरीके हैं और सबने उन्हें बखूबी निभाया। ज़िन्दगी जीना सही मायनों में यहीं सीखा था। एक मैगी में तीन शेयरिंग,600 ml की कोल्ड-ड्रिंक में आठ दावेदार,फिर भी कमियां महसूस नहीं हुई। होली की हुडदंग,दीवाली के पहले कैंपस का कश्मीर बन जाना,Fresher party की उत्सुकता और EPOQUE का उत्साह,कैसे भूल सकेगा कोई????? उतार चदाव आते गए,कभी मुश्किलों में किसी ने हमे संभाला,कभी खुशियों में हमने किसी को हिस्सेदारी दी और मुश्किलें आसान की। भाई-बहन-मां-बाप से परे भी रिश्ते इतने मजबूत होते हैं,यही पर समझ आई थी इस बात की........
पर अब अनुभव की इस दास्ताँ का अंत,वो सफ़र खतम हुआ,राहें अलग हो गयीं,मंजिलें अलग हैं,पथिक अनजान है/अकेला है। रात-रात भर एक दुसरे के कमरे में जाकर चर्चाएं खत्म,दोस्तों के नए नए क्रश बनाना खत्म,एक रूम में दो बेड पर 7-8 लोगों का एक साथ बैठकर मिथुन की मूवीज देखना खत्म,दारु के नशे में सबको अपने पुराने राज बताना खत्म,बिन बात की पार्टीज खत्म,एक साथ घुमने का प्लान खत्म,
खत्म,खतम,
सब कुछ,शायद - .....नहीं यकीनन, सब कुछ ख्त्म…………।
कैसे लौटाएं अब इन पलों को???
क्या यही ये सफ़र था,बिछडना ही नयी मंजिलें ढूँढने का एकमात्र विकल्प है,अजीब रीतियाँ हैं ना????
पर यही सच है,सिर्फ चंद लम्हे और फिर सब कुछ सूना,ये हॉस्टल,ये कैंपस,यहाँ की गलियाँ,ये कैंटीन,ये दोस्त,ये पार्टी,सब सूनी हो जायंगी ...
अरसे बाद जब कभी वापस आयेंगे यहाँ तो राहों के सूखे पत्ते हमे हमारे पुराने होने का एहसास करायेंगे,राह चलते किसी चेहरे में किसी अपने को ढूँढने की कोशिश,पर निराशा। गलियों से होकर क्लास से गुजरते वक़्त झाँकने पर सुनसान से कमरे में फिर वही हसीं सुनाई देगी जो कभी पीछे बैठकर एक साथ हंसी थी,हर एक कोना हमे सजीव-निर्जीव के रिश्तों के जुड़ाव का एहसास कराएगा और हम मचल उठेंगे,फिट से उन पलों को जीने,उन्ही सबके साथ,उसी मैदान में,उसी घास पर,फिर वही अन्ताक्षरी,फिर वही .......
काश फिर से ……………….
काश….
14 सितम्बर 2009 को पहले साल का शुरू हुआ सफ़र इतनी जल्दी बीतेगा ,उम्मीद नहीं थी,पर समय के पंखों की उड़ान क्या मापना? एक-एक करके दिन गुजरे,साल बीतता गया,जीवन में उतार-चदाव का संगम बनता रहा,नए-नए दोस्त,नए तौर-तरीके,कभी सीखते थे,कभी सिखाया भी,कुछ को प्यार की मंजिलें मिल गयीं तो कुछ तलाश में भटकते रहे पर सबने इन्हें खुलकर जिया। यारी-दोस्ती,प्यार-मोहब्बत के सबके अपने-अपने तौर तरीके हैं और सबने उन्हें बखूबी निभाया। ज़िन्दगी जीना सही मायनों में यहीं सीखा था। एक मैगी में तीन शेयरिंग,600 ml की कोल्ड-ड्रिंक में आठ दावेदार,फिर भी कमियां महसूस नहीं हुई। होली की हुडदंग,दीवाली के पहले कैंपस का कश्मीर बन जाना,Fresher party की उत्सुकता और EPOQUE का उत्साह,कैसे भूल सकेगा कोई????? उतार चदाव आते गए,कभी मुश्किलों में किसी ने हमे संभाला,कभी खुशियों में हमने किसी को हिस्सेदारी दी और मुश्किलें आसान की। भाई-बहन-मां-बाप से परे भी रिश्ते इतने मजबूत होते हैं,यही पर समझ आई थी इस बात की........
पर अब अनुभव की इस दास्ताँ का अंत,वो सफ़र खतम हुआ,राहें अलग हो गयीं,मंजिलें अलग हैं,पथिक अनजान है/अकेला है। रात-रात भर एक दुसरे के कमरे में जाकर चर्चाएं खत्म,दोस्तों के नए नए क्रश बनाना खत्म,एक रूम में दो बेड पर 7-8 लोगों का एक साथ बैठकर मिथुन की मूवीज देखना खत्म,दारु के नशे में सबको अपने पुराने राज बताना खत्म,बिन बात की पार्टीज खत्म,एक साथ घुमने का प्लान खत्म,
खत्म,खतम,
सब कुछ,शायद - .....नहीं यकीनन, सब कुछ ख्त्म…………।
कैसे लौटाएं अब इन पलों को???
क्या यही ये सफ़र था,बिछडना ही नयी मंजिलें ढूँढने का एकमात्र विकल्प है,अजीब रीतियाँ हैं ना????
पर यही सच है,सिर्फ चंद लम्हे और फिर सब कुछ सूना,ये हॉस्टल,ये कैंपस,यहाँ की गलियाँ,ये कैंटीन,ये दोस्त,ये पार्टी,सब सूनी हो जायंगी ...
अरसे बाद जब कभी वापस आयेंगे यहाँ तो राहों के सूखे पत्ते हमे हमारे पुराने होने का एहसास करायेंगे,राह चलते किसी चेहरे में किसी अपने को ढूँढने की कोशिश,पर निराशा। गलियों से होकर क्लास से गुजरते वक़्त झाँकने पर सुनसान से कमरे में फिर वही हसीं सुनाई देगी जो कभी पीछे बैठकर एक साथ हंसी थी,हर एक कोना हमे सजीव-निर्जीव के रिश्तों के जुड़ाव का एहसास कराएगा और हम मचल उठेंगे,फिट से उन पलों को जीने,उन्ही सबके साथ,उसी मैदान में,उसी घास पर,फिर वही अन्ताक्षरी,फिर वही .......
काश फिर से ……………….
काश….
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ReplyDelete@divyansh bahut bahut bahut hi acchcha likha hai yaar...
ReplyDeleteand moreover when it comes from heart ....
appreciation is not a need it becomes..a right....
simply awsm...
Bhai nikhil,bahut bahut dhanyavaad. In dil se nikli bhavnaao ko samjhne k liye...
ReplyDeleteMujhe ummeed thee tumse,kyoki gyan ko samajhne k liye kisi unche darje k insaan tumhi ho...
spellbound!!
ReplyDeletebhai,bahut bahut dhanyavaad......
DeleteMast bhai....
ReplyDeleteDhanyavaad sirji.....
DeleteREALLY DIVYANSH BHAI, VERY STRONG AND EMOTIONAL, BEST OF LUCK FOR UR FUTURE, I KNOW U CAN DO IT
ReplyDeleteDhanyavaad Anupam bhai, Zingadi badi hai aur sangharsh jaari hai, dekhte hain aage kya hota hai...
DeleteTum bas Hume Phone dilwa dena SAMSUNG..........:p